दिल की बात, धीरे से कहती हूँ, हौले से सुनना मैं शब्द हूँ ,मुझको भावों में, पिरो कर सुनना ।।
सोमवार, 16 फ़रवरी 2026
शनिवार, 10 मई 2025
"माँ"

मै सृजन करती
रचनात्मकता का स्वाद लेती
अधरों पर मधुरता रखती
हँसती खिलती स्रष्टि से
कांटे फूल अलग करती
लहू-लुहान होती हूँ
फिर भी
मुस्कान मेरी रहती
क्यूंकि मै हूँ सृजन कर्ता
मै हूँ "माँ"
एक कतरा धूप
शुक्रवार, 9 मई 2025
दुआ..
रविवार, 25 जून 2023
छोटी ...
तुम सुख में नहीं
तुम दुःख में नहीं
तुम दिल भी नहीं
तुम धड़कन भी नहीं
तो बताओ मुझे तुम
दिन रात मेरे
ख्यालों में क्यों ???
मै इन ख्यालों से दूर
तेरी शख्सियत से
बहुत दूर जाना चाहती हूँ
तेरी रूह से अलग
अपने हिस्से की जमीं
ढूँढना चाहती हूँ ....
ये कमबख्त दिल
सोते जागते
तेरे नाम की
माला जपा करता है
पता नहीं क्यों
तेरी ही बातों से
मायूस होता है
फिर मासूम सा बन
तेरी ही याद में
हर रोज़ पलके
भिगोया करता है.....
तुम दिन रात मेरे
ख्यालों में क्यों ???

तेरे साथ बिताये
वो सुनहरे पल
अब कभी नहीं आयेंगे
पर न चाहते हुए भी
तेरी याद से सराबोर
"मैं "
तेरी ही याद में
अतीत के आँगन से
कुछ फूल चुन
अपनी छोटी सी
बगिया में सजाती हूँ ।।
और उन यादो से
न जाने कैसे
तुम मेरी दुआ में
सुख में, दुःख में
दिल में, आत्मा में
उतर जाती हो ।।
तुम दिन रात मेरे
ख्यालों में रहती हो।
~ बोधमिता
छोटी
शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023
शनिवार, 2 अप्रैल 2022
नववर्ष
शनिवार, 6 जून 2020
garv
आज रोने को व्याकुल
हो चला मन
ऐ अंतर्मन तेरी कसम
खेल खिलौने रंग बिरंगे
चोकलेट आइस क्रीम रंग रंगीले
वस्त्रों का अम्बार लगा है
घर का हर कोना सजा हुआ है
फिर भी मन खरीदता फिरता
नाना वस्त्र 'औ' स्वाद चटखारे
बाजारों में रौनक होती
और जगमग कर उठता कोलाहल
मन कहता ये भी ले चल
मन के भीतर हरपल हलचल
एक छोटा बच्चा भूखा प्यासा
फटे चीथड़े वस्त्रों में
खड़ा हुआ ले भूखी आस
उदर अग्नि को शांत करने
चला आ रहा पीछे पीछे
कई धनाड्यों से दुत्कार खा चुका
फिर भी बेबस भूखा बच्चा
आँखों में मोती ले कहता
भूखा हूँ मै आज सुबह से
मेरे नहीं है माई - बाबा
भूखा हूँ मैं दे दो पैसा
खा लूँ एक समय कि रोटी... ..
आज खोखला हुआ दिखावा
बिखर गया एक सजा ह्रदय कक्ष
एक भूखे बच्चे को खाना
न खिला सका कोई गर्वीला मन
झूठा आडम्बर ओढ़ता फिरता
मेरे देश का सुखी संपन्न वर्ग
वर्गों में कट-बँट गया है
माँ के हर बच्चे का अंतस ...
--bodhmita
आजाद - देश!
युवा
उफ़ ये कैसा युवा वर्ग है
जिम में जाता जिमनास्ट नहीं है
खेलता कूदता सब की- बोर्ड पर
ना 'तन' स्वस्थ ना 'मन' स्वस्थ है
उफ़ ये कैसा युवा वर्ग है !
दुनिया इनकी बहुत बड़ी है
घर पर ही सब पा जाने की ख्वाहिश
पैसों की ताकत को जाने फिर भी
मुट्ठी कभी भी बंद नहीं है
उफ़ ये कैसा युवा वर्ग है !
इन्टरनेट को अपना माने
रिश्ते-नाते कर दिए किनारे
इनको भूख भी नेट की लगती
मैसेज ना पायें एक दिन भी
हो जाते ये बड़े बिचारे
उफ़ ये कैसा युवा वर्ग है !
मौसम कब दीवाना लगता
ये तो इनको होश नहीं है
घूमते बेसब्रों बेगानों जैसे
सोचे हम हैं बड़े सयाने
उफ़ ये कैसा युवा वर्ग है !
~ बोधमिता
बिटिया
![]()
दे गया उलाहना, संस्कारी मन !!
कैसे रौब गांठ लूँ तुझ पर,
तू मेरी नन्ही सी चिड़िया.
पिंजरे में बंद करूँ तो कैसे?
तू मेरी सांसों की हलचल.
किस अंकुश की खूंटी से बांधूं?
तू है मेरा नयन सितारा.
मेरी संस्कारों की बेडी ऐसी
जिसमे बंध बिंध गया लड़कपन
तुझको भी मन बांधना चाहे
तब दे गया उलाहना संस्कारी मन
हाथ पसारे गगन खड़ा है
नियति चक्र में रंग भरा है
इन्द्रधनुषी रंगों से आभाषित
गर्व - दर्प से चमके मस्तक
कलुष की कोई छाँव नहीं हो
हो उज्जवल अखंड ये तेरा जीवन
__बोधमिता
प्यार
प्यार करने वालों के दिल
कांच से क्यूँ होते हैं?
कभी सोचती हूँ दुनिया
बड़ी सुन्दर सजीली है
इसे सुन्दर बनाते हैं वो लोग
जिनके दिल की धड़कने
धड़कती है किसी और के लिए,
पर जहाँ ये धड़कने होती हैं
वो जगह बड़ी नाजुक सी होती है.
कभी सोचती हूँ के इस दौर में
प्यार करता है कौन?
जिनके दिल और दिमाग
परिपक्व होते हैं वो या
अपरिपक्व युवाओं के बीच ही
यह रिश्ता पनपता है और
दफ़न हो जाता है किसी गहरे गड्डे में
कहीं भी जाओ,किसी सड़क से गुजरो,
रेस्तरां में जाओ, बाग़ बगीचों में जाओ,
यहाँ तक की ऑनलाइन भी, हर तरफ से
आवाज आती है चटाक की ,
कांच ही तो है, चट से टूट जाता है
कभी न जुड़ने के लिए.
और जो कांच की चुभन होती है
वो बिखर जाती है सब तरफ, चारो ओर
जिनसे आह के सिवा
कुछ सुनाई ही नहीं देता.
कभी सोचती हूँ क्या
प्यार बुखार है छोटी कच्ची उम्र का?
या बदला है किसी टूटे हुए दिल का?
समझ नहीं आता , जाने कितने
लैला मजनू हुए , शीरी फरहाद हुए
फिर भी दुनिया में लोग आज भी
प्यार तो करते हैं, और करते रहेंगे.
दिल भी टूटेंगे, मुस्कुराहटें भी होंगी.
और ये दुनिया .......
ये दुनिया तो सुन्दर है, साहेब....
सुन्दर ही रहेगी
चाहे प्यार कांच से हो या पत्थर से !
~ बोधमिता
माँ मै तेरी प्यारी बेटी ,
गाँव
बिताये थे जहाँ
सुनहरे दिन बचपन के
वो गलियाँ अब भी
याद मुझे करती हैं,
उठाया करता था
जो घर मेरे नखरे हजार
वो दर-ओ-दीवार
इंतजार मेरा करते हैं,
सिखाया था जिसने
गिर कर सम्हलने का हुनर
उन रास्तों पर मुझ को
गुमान आज भी है,
पार कर शरारत की
हर सीमा को लांघा था
सुनो!उस बागीचे में
शैशव मेरा सुरक्षित है,
चिढ़ाया करते थे जो
बातों में मज़े ले कर
उन दोस्तों की यादों में
ज़िक्र मेरा हरदम है
तन्हाई में गाँव मेरे!
तुम ही तो साथी हो
काश! तुम पे वार सकूँ
जिंदगी जो बाक़ी हो।।
~बोधमिता
रात...
जिसमें सारी आधी बात
नयी पुरानी कुछ सौगात
दुल्हन लाने चली बारात
मनचलों की आवारगी सी
नवयुगलों की शर्मीली बात

आधे चाँद की पूरी रात
नयनों नयनों चलती बात
सपनों के सच होने तक
पलकें नहीं झपकाती रात
जाने फिर क्या होती बात
मलिन साँझ के साए सी
हो जाती कजरारी रात
नववधू प्रौढ़ा हो जाती
युवक अनन्त में खो जाता
गृहस्थी के बोझ तले
अस्तित्व दबा ही रह जाता
जीवन गुत्थी उलझी जाती
इन उलझे धागे सुलझाने
जागो सहृदयी रातों में
बैठो कुछ मिठास भरो
अपनी रीति बातों में ||
~बोधमिता
मंगलवार, 25 फ़रवरी 2020
मैं सोना चाहती हूँ...
मैं सोना चाहती हूँ
किंतु....
यह मन तुम्हारी
यादों की कलाई थाम
मुझे लिए जाता है
तुम्हारे इर्द-गिर्द
मनस पर भाव उकेरता है
हृदय को बड़ा तड़पाता है
सुनो.... मैं सचमुच
रातों के सुनसान में,
कतई जागना नहीं चाहती,
और स्त्रियों की तरह
नियम-पूर्वक, शांत-चित्त
उठना जागना चाहती हूँ,
सारी संवेदनाओं को
थके हुए शरीर के साथ
नींद से भरी पलकों में छुपा,
देखना चाहती हूँ
कई सच्चे झूठे सपने,
अलसुबह सपनों की
जुगाली करना चाहती हूँ
सुनो ... सुनो ना...
मैं सोना चाहती हूँ
किंतु...
निद्रा का आवाहन करते ही
तुम्हारे कहे अनकहे सारे शब्द
नर्तक बन घूमते हैं,
मेरे मनस पटल पर
उकेरते हैं कई तस्वीरें
तुम्हारी - मेरी,
उन तस्वीरों के
पृष्ठ होते-होते
अनगिनत हो जाते हैं
और मेरी बोझिल पलके
झटके से खुल जाती हैं,
खुली पलकों से
सारा संसार अधूरा लगता है,
अतएव, पुनः नींद के आगोश में
समा जाना चाहती हूँ
हाँ मैं सोना चाहती हूँ
सुनो ! मैं गहरी नींद सोना चाहती हूँ!!
~ बोधमिता
शनिवार, 18 नवंबर 2017
मन करता है!
उसको ही गुनती जाऊँ
मन करता है।
सुन उसकी बातों को
हँस-हँस दोहरी हो जाऊँ
मन करता है।
याद करूँ तन्हाई में
और हौले से मुस्काऊँ
मन करता है।
दिल मे रख तस्वीरें उसकी
तकदीर मैं उसकी बन जाऊँ
मन करता है।
रातों में उसकी ख्वाहिश ले
मैं तकिये में घुस जाऊँ
मन करता है।
याद आए जब महफ़िल में वो
नीची नज़रें कर शरमाऊँ
मन करता है।
अल् सुबह ओस कणों में
मुस्काता उसको पा जाऊँ
मन करता है।
सोते जागते हर क्षण में
उसको ही मैं जपती जाऊँ
मन करता है।
~ बोधमिता
रविवार, 25 जनवरी 2015
क्रोध.....
गुरुवार, 22 जनवरी 2015
ख्वाब

तुमको भीड़ में मिलाने की
बहुत कोशिश कर ली मैंने
सोचा था लोगो में खो कर
इतने न याद आओगे तुम
तुम्हारे ख्यालो को मैंने
बंद करना चाहा तालों में
और …
सोच लिया अब तुम फिर-
न आओगे मेरे ख्यालो में
पर तुम हर बार ही दस्तक
दे - दे कर
मन प्राण ही मेरे हरते हो
जब भी अकेली होती हूँ
खुद में……
प्रतिबिंब तुम्हारा पाती हूँ
ख्वाब सी लगती तेरी बातें
मैं खुद परी बन जाती हूँ
फिर सुध - बुध खो इस
दुनिया से
तेरे - मेरे सपने बुनती हूँ
जब टूटे भरम तो फिर से मैं
तुझको भीड़ में मिलाने की
नाकाम सी कोशिश करती हूँ .......
~ बोधमिता ~
बुधवार, 2 अक्टूबर 2013
मै !!!!
आया मुझे याद
मजबूत बनाना है
- बोधमिता ।।


