शनिवार, 19 जनवरी 2013

विडम्बना

नियति चक्र न रुका कहीं 
विडम्बना ही सही
चलती रही जीवन की गति 
कुछ टूटी सी कुछ फूटी सी 
कुछ उनके संस्कारों सी 
कुछ उनकी पहचानी सी
चल ही रही है 
बिन जीवनदाता के..........
अधकचरी सी जीवनी 

माँ पापा....
अनंत की यात्रा पर 
कर लेना तुम हमको याद 
देना आशीष हमे वहीँ से
जिससे ये जीवन हो जाये 
"निष्पाप"।।
                 ~बोधमिता   

8 टिप्‍पणियां:

  1. गहरे भाव,गहरे संस्कारों के निशाँ

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  2. बहुत 'निष्पाप ' सी अभिव्यक्ति और अंतस तक पहुँचते भाव ! बहुत सुन्दर !

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