गुरुवार, 29 नवंबर 2012

adhurapan

तेरे बारे में जो लिखती

बन जाती है एक कविता 

तू मेरे आदर्शों में स्थापित 

क्यूँ बैठी है रूठ के मुझसे 

तेरे बिना ये जीवन सूना 

सूनी हर एक राह डगर की 

छोड़ न तू साँसों की डोरी .....

या हिम्मत दे दे मुझको इतनी 

की जी लूँ मैं  ये जीवन ऐसे 

जिसमे हो प्रतिबिम्ब तुम्हारा 

देखकर मुझको लोग ये बोले 

देखो आयी  'उषा' की बेटी ।। 

                         ~बोधमिता 

क्या माँ के बिना जीवन चल पता है??? 

mamma i miss u....

बुधवार, 28 नवंबर 2012

दिल की बात



















दिल की बात

धीरे से कहती हूँ

हौले से सुनना

मै  शब्द हूँ

मुझको भावों में

पिरों कर सुनना

कल्पना के  जंगल

से प्यारी बातों को

छाँट  कर चुनना

मैं   माया   हूँ

 मुझको सपनो में

 पिरो कर बुनना ।।

                  ~ बोधमिता

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

rishta











मैंने जीवन के

 उतार - चढ़ाव देखे

तुम्हारी नज़रों से

 ज्वार - भाटे  की तरह

अपने से दूर  किया

तुमने  मुझे हाथ से

फिसलती हुई

रेत की तरह ।।

                     ~बोधमिता








शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

बचपन

कोई आ रहा है मेरे
बचपन के गाँव  से

धूल मिट्टी से सने हुए 
 हाथ  -   पैर
साथ साथ सायकल से गिरकर 
आये जो चोट के निशान 
खेल खेल में होने वाली 
तू-तू मैं-मैं से उपजी
     खिसियाहट 
एक दूसरे को मारने छेड़ने की 
   हरदम तिलमिलाहट
गिल्ली अपनी चतुराई से
आगे ले जाने की
 कसमसाहट 
खुद को हरदम जीतता हुआ 
      देखने का घमण्ड   
रेत पर घरोंदे बनाने और 
तोड़ने का सुकून
जिम्मेदारियों का आभाव 
चेहरे  पर हरदम
ताजे फूल सी मुस्कान 
भले ही कुछ देर के लिए 
वो ला रहा है 
मेरे बचपन के गाँव से 
कोई आ रहा है 
मेरे बचपन के गाँव से ।।
                        ~ बोधमिता 





मन ...


मन ये ऐसा बंधा हुआ है
पिंजरे  में बंद चिड़िया जैसे
जितना मै सुलझाना  चाहूँ
उलझा जाये सूत के जैसे
पंख लगा कर उड़ना चाहूँ
गिरता जाये पानी में पत्थर हो जैसे
आल्हादित हो खुश होना चाहूँ
ये  हो जाये सूने घर और आंगन जैसे

पर ये मन हार न माने
चीटी गिर-गिर चढ़ती  जाये जैसे
साहस तो देखो इस मन का
तोड़े इसने बंधन सारे
बैठ कर हर एक सूत काते
पत्थर  के टुकड़े कर डाले
सूना मन आबाद किया फिर
फिर तडपा यह  सूनेपन  को ।।

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

श्याम















सांवली सूरत में,

मोहनी मूरत में,

'श्याम' तुम जचते हो।

अधरों की हंसी से,

बातों की मस्ती से,

'श्याम' तुम जचते हो।

लम्बे-लम्बे बालों में,

काली तिरछी आँखों में,

'श्याम' तुम जचते हो।

नटखट सी चालों में,

भोली सी बातों में,

'श्याम' तुम जचते हो।

तिरछी मुस्कानों में,

गलों के डिम्पल में,

'श्याम' तुम जचते हो।।
               
                     ~ बोधमिता 

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

सृजन कर्ता


मै         सृजन           करती

रचनात्मकता का स्वाद लेती

  अधरों पर मधुरता रखती

   हँसती खिलती स्रष्टि से

   कांटे फूल अलग करती

   लहू-लुहान   होती    हूँ

         फिर      भी

   मुस्कान मेरी रहती

  क्यूंकि मै हूँ सृजन कर्ता

    मै      हूँ     "माँ"





जिंदगी!!!


कुछ जिन्दगियाँ

 कितनी आसान

       होती है 

   जरूरी नहीं

 इन्सान का जनम     

 ही मोक्ष के  लिए हो

यहाँ तो जानवर

 इंसानों से ज्यादा 

 अच्छा जी लेते हैं

एक वो जीवन जहाँ

 इन्सान कचरे से 

खाना बीन रहा है 

और एक वो जहाँ 

जानवर नखरों से 

खाना सूंघ रहा है 

गजब है रे दुनिया,

गजब है रे जीव !!                   ~बोधमिता 

vyakulta


एक आवरण में समा जाने के लिए, 

 मै व्याकुल हूँ 'तुझे' पा जाने के लिए | 

दीयों में रौशनी सदैव झिलमिलाने के लिए 

 मै व्याकुल हूँ 'बाती' बन जाने के लिए | 

कुछ कदम उठते हैं डगमगाने के लिए, 

मै व्याकुल हूँ उन्हें 'थाम' लेने के लिए | 

मुख में वाणी मिठास बिखेरने के लिए, 

मै व्याकुल हूँ 'जिह्वा' बन जाने के लिए | 

पौधों में पुष्प खिलखिलाने के लिए, 

मै व्याकुल हूँ 'तितली' बन जाने के लिए | 

सागर में नदियाँ मिल जाने के लिए  

मै व्याकुल हूँ 'धरा' बन जाने के लिए | 

                                      ~बोधमिता                                    

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सोमवार, 24 सितंबर 2012

रंग




















आज यूँ ही उठ कर
चली आई तेरे सामने 
न कोई साज-सज्जा 
न कोई बनाव-सिंगार 
यूँ तो हर वक़्त 
तेरे लिए सजने-सवरने 
का मन होता है 
पर आज ......
आज व्यथित है मन 
और द्रवित भी ...
तुम मेरे लिए निष्कपट 
और निश्छल हो हमेशा 
यह  जानती   हूँ   मै 
परन्तु रहो सदैव 
मेरी जिंदगी में 
यह नहीं चाहती  
मेरी जिंदगी जैसी 
श्वेत और श्याम थी 
तुम्हारे बिना 
मुझे वैसी ही जिंदगी 
के साथ रहना था 
पर तुम्हारे आते ही 
रंग भरने लगते हैं 
आँखों में सपने 
उतरने चढने लगते हैं 
तब लगता है की मै 
इन्द्रधनुष और तुम 
इन्द्र की तरह हो 
तुम्हारी आँखों में 
कभी छल कपट 
नहीं दिखता मुझे 
बस यही निष्कपटता  
तुम्हारी मुझे कर देती है 
तार     -      तार 
मै दुनिया का  एक 
बड़ा छलावा   हूँ 
तुम मुझसे दूर रहो 
कहीं मेरी संगती से 
तुम में वो अवगुण 
ना आ जायें  जो 
इन्द्र को कुटिल 
और श्रापित 
कर देता  था ।।
      ~बोधमिता 

घात

पतंग की एक डोर थी
जो हाय मैंने छोड़ दी

समय के साथ उड़ रही
मुझे लगा की सध  गयी
था डोर पर मुझे यकीं
वही  घात  दे  चली ।

व्यंग की कटार  से
हाथ मेरे बिंध गये
फिर भी थामती रही
पतंग को चाहती रही



पतंग थी मेरी मनचली
जिधर हवा उधर चली
फिर भी डोर  हाथ में
थामती  ख़ुशी से मै

सोचती गगन तेरा
कर मौज से अठखेलियाँ
बुरी कोई नजर उठी तो
खींच  थाम  लूँ  तुझे

हाय !! ऐसा न हुआ
डोर दे गई दगा
मर्म मर्म भेद कर
वो हाथ छलनी कर गई ।।
                       ~ बोधमिता



निर्वाण

निस्तेज सा सूरज लगे
निष्प्राण सी निज चेतना
नि:शब्द  सी वायु चले
नि:शक्त  सी हर वेदना
निकुंज कैसा है यहाँ
निष्ठुर दिखे मन आँगना
निमग्न होते जा रहे
निबद्ध सरे पल जहाँ
निमिष-निमिष कर जल रहा
निर्माल्य नारी - जाति  का
निर्भेद कर निर्मुक्त कर
निर्वाण सी यह प्रेरणा ।।
                 ~बोधमिता

priytam

कभी अच्छी तो कभी
बहुत  बुरी जिंदगी
गुजार रही हूँ मैं
तुम्हारे    बिना ।
कभी छोटी सी
बात गुदगुदाती है
कभी सुई मात्र
  गिरने    से
काँप जाती हूँ मैं
तुम्हारे    बिना ।
कोयल का गाना
बहुत प्यारा है यहाँ
पर जब हवा मुझे
छू कर गुजरती है
तब विष बुझे बाण
सी लगाती है मुझे
तुम्हारे     बिना ।
सूरज का बाल रूप
बहुत मनमोहक
और लुभावना है
फिर भी मन कोई
गीत गाता नहीं
तुम्हारे    बिना ।
                 ~बोधमिता .




     

रविवार, 8 जुलाई 2012

"बहन "

चलते ~ फिरते 
आते   जाते 
उन गलियों के 
चौबारों   में 
जब ~ जब मैं 
झाँका करती हूँ 
तब तू बड़ा
याद आती है 
"बहन"

माँ का गुस्सा 
लाड पिता का 
सबका किया था 
हमने सांझा 
सुख भी बाँटा 
दुःख भी बाँटा 
बाँट लिया था 
थोडा जीवन 
फिर ऐसा क्या 
इतर हुआ  कि 
मेरी अपनी 
और है दुनिया 
तेरी दुनिया 
कहीं और की 
कितने उत्सव 
आते जाते 
कितनी खुशियाँ 
भी मन जाती 
सब मिल कर 
कितना कुछ करते 
तब तू इक 
"याद"
सी बन कर 
बस रह जाती है 
"बहन"
                                         ~ बोधमिता 

शुक्रवार, 6 जुलाई 2012

निरामय

निस्तेज सा सूरज लगे
निष्प्राण सी निज चेतना
नि:शब्द सी वायु चले
नि:शक्त सी हर वेदना
निकुंज कैसा है यहाँ
निष्ठुर दिखे मन आँगना
निमग्न होते जा रहे
निबद्ध सारे  पल जहाँ
निमिष - निमिष कर जल रहा 
निर्माल्य नारी जाति  का
निर्भेद कर निर्मुक्त कर
निर्वाण  सी यह प्रेरणा ।
                             ~ बोधमिता  

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

बेबसी

आज अचानक

सड़क के मोड़ पर 

वो मिला मुझे 

जो कभी मेरा

बड़ा ही प्यारा 

मित्र हुआ   करता   था

समय के साथ 

हम-दोनों बड़े होते गए

और   रम   गए

अपनी  -  अपनी

हसीन  दुनिया  में 

मिलते   ही   उसने 

बड़े ही अपनत्व से 

बड़े  ही  दुलार   से 

बड़े ही आनंद से 

मुझ   से   पूछा -

कहो क्या हाल हैं ?

मैंने   कहा   भाई, 

बचपन से आज तक

जो   मुस्कान   मेरे

 होठों से चिपकी है 

गयी नहीं अब तक 

मैं  जैसी  तब  थी मस्त, 

बेबाक और खुशमिजाज़ 

आज भी हूँ तुम   कहो  

 तुम्हारे क्या    हाल    हैं 

तुम्हारे  सर   के 

उड़े हुए क्यूँ बाल हैं 

वो हुआ बड़ा हताश 

और निराश फिर ली

एक लम्बी सांस और   

 बोला -मुझ पर तो 

बड़ा ही     भार      है,

बड़ा सा घर आँगन 

और  परिवार   है 

न जाने ये मुस्कान 

मेरी कब से गायब है 

एक    अदद   बीवी 

और दो बच्चों के साथ 

महंगाई की पड़ी मार है 

यूँ     तो     मैं     भी हँसना 

मुस्कराना चाहता हूँ  

पर पता नहीं कब 

और कैसे घर  का  सदस्य  

न  होकर कैशिअर  

 ही   बन जाता हूँ 

हर  वक़्त  झल्लाहट

 लिए घर   से   निकलता    हूँ

अपनी  बेबाकी  पर 

खुद ही पछताता हूँ  

न    जाने    कब किस   बात   पर 

हर कोई मुझे रुला जाता है 

अब मैं  सदमों से त्रस्त

बेबस  बेचारा  इंसान 

नज़र  आता   हूँ 

अब मैं सदमों से त्रस्त 

बेबस बेचारा इन्सान नज़र आता हूँ ।      

                                                       ~बोधमिता